एक अभिनव उदाहरण--राजकीय महाविद्यालय बाड़मेर का मैदान,समय सुबह के 4.30 मिनट,एक लंबी सिटी की आवाज के साथ एक नई सोच और कुछ कर गुजरने के उद्देश्य से एक साथ कदमो की एक संगीतमय कदमताल सुनाई पड़ती है। सुनसान सुबह को चीरती हुई आवाज "कैडेट थम" कहते ही एकाएक शांत हो जाती है।

एक विशेष आवाज जो आज हर किसी मजबूर विद्यार्थी के सपनों को साकार करने का दम भरती है। पूरा बाड़मेर उस मंद मुस्कान भरे चेहरे के पीछे छिपे गहरे राज को जानता है, शायद कुछ कर गुजरने की गहन तम्मना उसे सोने नहीं देती है और फिर सफर का आगाज शुरू हो जाता है।
वर्षों पहले मैंने बिहार के आनंद कुमार और एक आईपीएस की कहानी पढ़ी जो "सुपर 30" नाम से एक संस्थान चलाते थे और वास्तव में 30 बच्चो को लेकर उनको ही टारगेट करके वास्तव में सुपर बनाने का जज्बा लेकर अपने कार्य की परिणीति करते थे।
ऐसा ही मिलता जुलता एक उदाहरण आजकल सदा अकालों और अभावों से जूंझने वाले बाड़मेर जिले में भी देखने को मिल रहा है।
राजकीय महाविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफ़ेसर केप्टन (डॉ) आदर्श किशोर जाणी जिन्होंने कि बहुत ही छोटी उम्र पहले तो स्वयं बहुत अच्छा मुकाम हासिल किया और उनके स्वर्गीय पिताजी समाजसेवी श्री उमाराम जी जाणी साहब के सपनो को आज भी जिवंत रूप प्रदान करने का काम कर रहे है। अनेक विद्यार्थियों का अब तक राजकीय सेवा में चयन करवा चुके है और आज भी अनवरत प्रयासरत है।डॉ साहब सुबह 4.30 बजे उठकर उसी कॉलेज मैदान में आ डटते है जहाँ उनके साथ 100-150 जवान बालक जो कि गरीब, असहाय और महाविद्यालय परिवार से जुड़े है लेकिन आर्थिक परिस्थितियों के कारण महँगी कोचिंग क्लास नहीं जा सकते। ऐसे अनेक विद्यार्थियों के सपनो तारणहार और उनके सपनो में संजीवनी बूटी भरने का विश्वास लेकर अपने कर्तव्य पथ पर निकल पड़ते है।आज के इस स्वार्थ परक ज़माने में जहाँ इंसान के लिए पैसा ही सब कुछ है, उस परिदृश्य में सकारात्मक भावना के साथ सब कुछ निःशुल्क सेवा देने का भाव अगर कहीं देखना हो तो वो जीती जागती मूरत अपने बाड़मेर में ही मिल जायेगी। बस विद्यार्थी का जज्बा जिवंत होना चाहिए और लक्ष्य एक ही होना चाहिए फिर परिणीति होने में डॉ साहब कोई कमी नहीं रखते।उनके प्रयास के बलभूते ही उनकी टीम अविरल रूप से बढ़ती जा रहीहै उनके प्रयास का ही नतीजा है कि आज हर कोई अपनी सेवा देने को तत्पर रहता है।

समय-समय पर यहीं से राजकीय सेवा में चयनितऔर अन्य चयनित मोटिवेशन करने को तत्पर रहते है।बाड़मेर ncc और "उजास" संस्थान के बैनर तले ऐसा काम वास्तव में काबिले तारीफ है।

संदर्भ: जेठाराम पचार लोहारवा




बच रही थी जागीरें जब, बहु बेटियों के डोलों से,
तब एक सूरज निकला, ब्रज भौम के शोलों से,
दिन नही मालूम मगर, थी फरवरी सत्रह सो सात,
जब पराक्रमी बदन के घर, पैदा हुआ बाहुबली जाट,
था विध्वंश था प्रलय, वो था जिता जागता प्रचंड तूफां,
तुर्कों के बनाये साम्राज्य का, मिटा दिया नामो निशां,
खेमकरण की गढी पर, बना कर लोहागढ ऊंचा नाम किया,
सुजान नहर लाके उसने, कृषकों को जीवनदान दिया,
बात है सन् 1748 की, जब मचा बगरू में हाहाकार,
7 रजपूती सेनाओ का, अकेला सूरज कर गया नरसंहार,
इस युद्ध ने इतिहास को, उत्तर भारत का नव यौद्धा दिया,
मुगल मराठों का कलेजा, अकेले सूरज ने हिला दिया,
मराठा मुगल रजपूतो ने, मिलकर एक मौर्चा बनाया,
मगर छोटी गढी कुम्हेर तक को, यह मौर्चा जीत न पाया,
घमंड में भाऊ कह गया, नहीं चाहिए जाटों की ताकत,
मराठों की दुर्दशा बता रहा, तृतीय समर ये पानीपत,
अब्दाली के सेना ने जब, मराठों की औकात बताई,
रानी किशोरी ने ही तब, शरण में लेके इनकी जान बचाई,
दंभ था लाल किले को खुद पे, कहलाता आगरे का गौरव था,
सूरज ने उसकी नींव हीला दी, जाटों की ताकत का वैभव था,
बलशाली था हलधर अवतारी था, था जाटों का अफलातून,
जाट प्लेटो गजमुखी वह, फौलादी जिस्म गर्वीला खून,
हारा नहीं कभी रण में, ना कभी धोके से वार किया,
दुश्मन की हर चालों को, हंसते हंसते ही बिगाड़ दिया,
ना केवल बलशाली था, बल्कि विधा का ज्ञानी था,
गर्व था जाटवंश के होने का, न घमंडी न अभिमानी था,
25 दिसंबर 1763 में, नजीबद्दीन से रणसमर हुआ,
सहोदरा की माटी में तब, इसका रक्त विलय हुआ,
56 वसंत की आयु में भी, वह शेरों से खुला भिड़ जाता था,
जंगी मैदानों में तलवारों से, वैरी मस्तक उड़ा जाता था,
वीरों की सदा यह पहचान रही है, रणसमर में देते बलिदान है,
इस सूरज ने वही इतिहास रचा, शत शत तुम्हें प्रणाम है,
अमर हो गया जाटों का सूरज, दे गया गौरवगान हमें,
कर गया इतिहास उज्ज्वल, दे गया इक अभिमान हमें,
'तेजाभक्त बलवीर' तुम्हें वंदन करे, करे नमन चरणों में तेरे,
सदा वैभवशाली तेरा शौर्य रहे, सदा विराजो ह्रदय में मेरे,
लेखक-
बलवीर घिंटाला तेजाभक्त 
मकराना नागौर
9414980515





~ अमर शहीद चंपालाल जी गील ~
=पारिवारिक परिचय =
शहीद चंपालाल गील का जन्म नागौर जिले के गाँव सांजू मेँ 2 फरवरी 1975 को पिता श्री मुकनाराम जी के घर माता श्रीमति मोहनीदेवी की
कोख से हुआ । आप 5 भाईयों में सबसे बड़े थे। इसलिए पारिवारिक जिम्मेदारियों का अहसास बहुत जल्दी हो गया।
आपका विवाह कसणाऊ निवासी श्री चत्तराराम जी की पुत्री इंद्रा देवी के साथ सम्पन्न हुआ । आपके पुत्र का
नाम महिपाल (18वर्ष) है ।
=-शिक्षा =
शहीद चंपालाल गील ने 12 वीं तक राजकीय विधालय, सांजू से शिक्षा ग्रहण की थी । आपमें विधार्थी जीवन से ही देशभक्ति की भावना प्रज्ज्वलित हो चुकी थी।
=सेना में चयन =
अध्यापन काल के दौरान ही आपने सेना मेँ जाकर भारत माँ की सेवा करने को अपना लक्ष्य बना लिया । 12 वीं तक शिक्षा करने के पश्चात आप
सेना मेँ चयन हेतु जी-तोड़ मेहनत करने लगे और इस तरह वर्ष 1995 मेँ आपका चयन भारतीय सेना की "3 ग्रेनेडीयर्स रेजिमेँट" मेँ सिपाही के रूप मेँ हुआ । 28 अगस्त 1995 को आपने अपना नियुक्ती पत्र ग्रहण किया ।
=देशसेवा में बलिदान =
वर्ष 1998 मेँ आप श्रीनगर के मंगत सैक्टर मेँ तैनात
किये गये । उस रात इन्हेँ सूचना मिली की कुछ आतंकी
भारतीस सीमा मेँ प्रवेश कर रहे हैँ । उस समय चलाये गये 'ऑपरेशन रक्षक-3' में आपने साहस व शौर्य का अप्रतीम परिचय दिया। दुश्मन की गोली लगने के कारण हमारे जाबांज सिपाही चंपालाल जी गील भारत माता के आँचल मेँ
चिरनिद्रा में सौ गये ।
12 राष्ट्रीय रायफल के सिपाही शहीद चंपालाल गील (2688719W GDR) 5 फरवरी 1998 को आतंकवादियोँ के साथ मुठभेड़ में शहीद हुए ।
"किसी का चिह्न वोटोँ पे,
किसी का चित्र नोटोँ पे,
शहीदोँ तुम ह्रदय मेँ हो,
तुम्हारा नाम होठोँ पे"
=सेना मेडल =
शहीद चंपालाल गील को मरणोपरांत उनके अदम्य साहस व वीरता के लिए सेना मेडल से सम्मानित किया गया।
=शहीद का अंतिम संस्कार =
दिनांक 9 फरवरी 1998 को प्रात: 10:00 बजे शहीद
चंपालाल का शव उनके पैतृक गांव सांजू लाया गया । समस्त ग्रामवासीयोँ की आँखे इस बेटे का मुख देखकर छलछला उठी । शहीद के अंतिम संस्कार मेँ हजारोँ की तादाद मेँ लोग इक्कठे हुए । नागौर जिले
के पदाधिकारी, राजनितिक शख्सियतोँ ने अंतिम
यात्रा मेँ सम्मिलित हो शहीद को अंतिम विदाई दी ।
=मूर्ति अनावरण =
शहीद के भाई गोपालराम गील ने ग्राम सांजू मेँ शहीद चंपालाल की मूर्ति लगाने का निश्चय किया। दिनांक 5 जून 2013 को भव्य व विशाल मूर्ति का अनावरण किया गया । हजारों की संख्या में लोगों ने पहुंचकर उस पल को ऐतीहासिक बना दिया।
समस्त देशवासियोँ को शहीद चंपालाल जी जैसे वीर सैनिको पर नाज है, जो अपने प्राणोँ की आहूति दे कर करोड़ोँ जानोँ की हिफाजत करते हैँ । शहीद चंपालाल की शहादत
को देश युगोँ युगोँ तक याद रखेगा ।
॥ जय हिँद ॥
Source:   Jatland
लेखक -
बलवीर_घिंटाला_तेजाभक्त
मकराना_नागौर
09414980415
सहयोगकर्ता -
रामकिशोर_जी_गील
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*जय तेजाजी की बंधुओं..*
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पूर्व पोस्ट में हमने *तेजाजी के पूर्वजों* के बारे में संक्षिप्त जानकारी पढी कि वीर तेजाजी महाराज के पूर्वज किस वंश शाखा से संबंधित थे तथा कैसे मध्य भारत से चलकर मारवाड़ में अपने संघर्ष व बाहुबल के आधार पर जायल-धौळीडेह होते हुए खरनाल में गणराज्य स्थापित किया।
जैसा कि पूर्व विदित है *वीर तेजाजी महाराज के षड़दादा श्री उदयराज जी* ने खरनाल परगने पर आधिपत्य कर उसे अपने गणराज्य की राजधानी बनाया।
तत्पश्चात *नरपाल जी, कामराज जी, बक्शाजी अथवा बोहितराज तथा ताहड़ जी* ने गणराज्य का शासन भार संभाला।
नरपाल जी व कामराज जी की शासनावधि अल्पसमय ही रही।
तत्पश्चात बोहितराज जी ने शासन भार संभाला। बोहितराज कितने भाई थे तथा उन्होने कब से शासन कार्य शुरू किया इसकी उपलब्ध जानकारी अभी तक नहीं मिल पाई है।
*==बोहितराज या बक्सा जी धौळिया==*
वीर तेजाजी महाराज से संबंधित अनेक लेखकों द्वारा लिखित संक्षिप्त जीवनीयों, आम बोल चाल की वार्ताओं तथा वर्तमान समय में तेजाजी पर गाये जाने वाले गीतों में तेजाजी के पिता जी का नाम बक्साजी लिखा व बोला जातै है। मगर यह सरासर गलत और भ्रांतीपूर्ण है।
वीर तेजाजी के वंश के *भाट भैरूराम डेगाना* की पोथी में तेजाजी तक 21 पीढीयों का नाम दिया गया है, जिसमें तेजाजी के पिता का नाम *ताहड़ जी (थिरराज जी)* व दादाजी का नाम *श्री बोहतराज जी (बक्साजी)* अंकित है।
और यही प्रमाणिक सत्य है।
और आप सभी आधुनिक लेखकों से भी अनुरोध हे कि इस सत्य को हि अपने लेखन में जगह देवें।
साथ ही वर्तमान गायकों से निवेदन है कि अपने नवगीतों में किसी भी प्रकार की भ्रांती फैलाने से बच के रहें।
मेरे युवा साथियों आप तेजाजी के इतिहास को मानस पटल पर अंकित कर लेवें। अगर कहीं भी किसी लेखक या गायक द्वारा तेजाजी महाराज के इतिहास में कोई विरोधाभास दिखे तो उसका तुरंत विरोध करें।
*==बक्सा जी धौळिया==*
संत कानाराम जी ने बक्सा जी धौळिया नाम के संबंध में काफी खौज खबर जिसमें यही साबित हुआ की बोहितराज जी ही बक्सा जी थे, और तेजाजी महाराज के दादाश्री थे।
जैसा कि ग्रामीण परिवेश में प्रत्येक व्यक्ति के दो नाम अमूमन देखने को मिलते हैं उसी भांती बोहतराज जी का आम बोलचाल में बक्सा जी नाम स्वीकार्य किया गया है।
*==बक्सा जी के पुत्र==*
भाट भैंरूराम डेगाना की पोथी में बक्सा जी के सात पुत्रों का नाम सहित उल्लेख मिलता है। जिसमें से वीर तेजाजी महाराज के पिताजी श्री ताहड़ जी सबसे बड़े पुत्र थे।
इस प्रकार तेजाजी के 6 काकाओं का उल्लेख इस पोथी में है।
*मेरे आदर्श लेखक स्वर्गीय मनसुख जी रणवां जी* ने बक्साजी को तेजाजी का ताऊ लिखा है। यह प्रमाणित नहीं हो पाया।
*==ताहड़ जी का शासन भार संभालना==*
अपनी वृद्धावस्था के दौरान बक्सा जी ने अपने गणराज्य की प्रजा से रायशुमारी कर तथा सभी के सुझाव को मानते हुए ताहड़ जी को अपना उत्तराधिकारी बनाया।
जाट शासक सदैव ही गणतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास करते आये हैं। जाट गणराज्यों में अन्य जातियों की तरह राजनीतिक षड़्यंत्र देखने को नहीं मिलता।
तभी तो सभी भाईयों में छोटे होने पर भी ताहड़ जी ने वीर तेजाजी महाराज को उनकी योग्यता, काबिलियत तथा उनकी वीरता को देखते हुए अपना युवराज घोषित किया। इस पर एक भी बड़े भाई ने आपत्ति नहीं की और ना ही भाईयों में होने वाले कलंकित युद्ध व षड़्यंत्र हुए। बल्कि सभी ने वीर तेजाजी महाराज के संरक्षक के रूप में कार्य किया।
*==बक्सा जी वीर तेजाजी महाराज के संरक्षक के रूप में==*
लगभग 50-55 वर्ष की उम्र में वीर तेजाजी महाराज की हत्या कर दी गई। उनकी हत्या धौखे से हुई जिसमें जायल के डाकू "बाला" व चांग के मिणाओं का सरदार 'डाकू कालिया' था कि भूमिका रही।
*(इस घटना की जानकारी फिर कभी विस्तार से आप सभी तक पहुंचाऊंगा)*
अपने पिताजी व खरनाल के गणपति ताहड़ जी धौळिया की हत्या के समय वीर तेजाजी महाराज मात्र 9 वर्ष के थे तथा अपने ननिहाल त्यौद में मामओं के संरक्षण में रहकर अस्त्र शस्त्र, घुड़सवारी, युद्ध कौशल व शास्त्र ज्ञान ग्रहण कर रहे थे।
अपने भाइयों में सबसे कुशल ताहड़ जी ही थे। दूसरी तरफ ताहड़ जी के पुत्र भी प्रशासन को संभाल पाने के लिए उपयुक्त नहीं थे क्योंकि वे किसान की भांति ही रहे हुए थे।
अन्य जातियों के राजकुमारों की तरह जाटों के राजकुमार विलासी नहीं रहे कभी। चाहे वे राजकुमार हो मगर आम जनता की तरह ही खेती व पशुपालन का काम करते थे।
इस प्रकार ताहड़जी की असमयिक मृत्यु व वीर तेजाजी महाराज के अल्पायु होने के कारण राज्य में संकट के बादल छा गये। तब प्रजा ने एक स्वर में कहा कि *'बोहतराज' जी को ही पुन: गणपति व तेजाजी के व्यस्क होने तक उनका संरक्षक बनाया जाये।* अपनी प्यारी जनता की राय को सर आंखो पर रखकर 'बक्सा जी' पुनः गणपति पद पर आसीन हुए।
और यहीं से बक्सा जी का तेजाजी के पिता होने की भ्रांति हमारी पीढी तक पहुंची।
बक्सा जी वीर तेजाजी महाराज के दादाजी थे और यही सत्य है। वीर तेजाजी के संरक्षक के रूप में होने के कारण आधुनिक लेखकों द्वारा उन्हें तेजाजी के पिता समझ लिया गया।
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प्रिय बंधुओं बक्सा जी के बारे में लिखित इतिहास ना के बराबर उपलब्ध है मगर मेरे गुरु व शोधकर्ता संत कान्हाराम जी व मैंने तेजाजी के ज्ञात इतिहास से संबद्ध कर तथा कुछ अपने स्तर पर दिमागी कसरत करके तात्कालिक घटनाओं को एकसूत्र में पिरोने का प्रयास किया है। इन घटनाओं व इतिहास थौड़ी बहुत खामी रह सकती है मगर तेजाजी महाराज के इतिहास को देखते हुए ये घटनाएं सत्य है इसका हम दावा कर सकते हैं।
...
*वीर तेजाजी महाराज के इतिहास अगली कड़ी में हम तेजाजी के माता (रामकुंवरी व रामी) पिता (ताहड़जी) के विवाह व तेजाजी के बड़े भाईयों के संबंध में चर्चा करेंगे।*
*~ जय वीर तेजाजी ~*
> *लेखक*
*बलवीर घिंटाला तेजाभक्त बूड़सू*
मकराना नागौर
9414980415
*संत कान्हाराम (अध्यापक)*
सुरसुरा, अजमेर
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जय वीर तेजाजी बंधुओं..
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आज तेजाजी महाराज के पूर्वजों की जानकारी आपको देने का प्रयास करूंगा। किसी भी प्रकार की त्रुटी हो अथवा इसके अलावा कोई नवीन तथ्य या जानकारी आपके पास उपलब्ध हो तो प्रत्युत्तर में अवश्य बतायें।
...
जैसा की आप जानते हैं वीर तेजाजी महाराज नागवंशी जाट थे।
प्राचीन आर्यों के मूल रूप से चार वंश थे। जिसमें से एक मुख्य वंश 'नागवंश' था। इस नागवंश की 9 ज्ञात शाखाएं मानी गई है। इन्हीं नौ शाखाओं में से एक थी- श्वेतनाग शाखा।
ईसी शाखा से तेजाजी के पूर्वज संबंधित थे।
जैसा की मारवाड़ क्षैत्र में सफेद को धौळा कहा जाता है। उसी तरह श्वेतनाग से धौळिया नाग शब्द का प्रचलन शुरू हो गया। जब तेजाजी पूर्वज मध्य भारत से मारवाड़ की तरफ आये तो वे श्वेतनाग जाट से धौळीया गौत्री नागवंशी जाट के रूप में मारवाड़ के जायल क्षैत्र में आबाद हुए।
यहां के मूलनिवासी काला गौत्री जाट थे जिनके 27 गांव आबाद थे। जो कि प्राचीन काल से बसे थे और यहां की भूपती थे।
जब धौलिया गौत्री जाटों ने जायल में बसना चाहा तो राजनीतक कारणों के चलते काला गौत्री जाटों से उनका संघर्ष हुआ। इस झगड़े में जीत धौळियों की हुई मगर दुश्मनी का यह बीज सदीयों तक निरंतर प्रस्फुट्टित होता रहा। (इसी कुंठावश काला गौत्री जाटों ने जायल के खींचियों के साथ मिलकर तेजाजी के पूर्वजों के संबंध में उलजुलूल व मनगढंत कहानियां फैलायी। जिसके परिणामस्वरूप तेजाजी को राजपूत तक घौषित कर दिया। और दुर्भाग्य देखो आज के कुछ नासमझ जाट भी इस भ्रांती का भूसा दिमाग में लिये घूम रहे हैं)
काला जाटों से कभी न खत्म होने वाले इस झगड़े को देखते हुए तथा कालों पर रहम करके धौळिया जाट औसीयां-नागौर सीमा पर स्थित गांव करणू (धौलीडेह) में निवासित हुए। 
(डेहर/डेह/बाढ यह एक समतल खेत का प्रकार होता है। जो पशुचारण व खेती के लिए प्रयोग में लिया जाता है।)
इसी कारण यह क्षैत्र "धौळियों की डेह" अर्थात् "धौळीडेह" कहलाया।
मगर यह क्षैत्र समृद्ध ना समझते हुए तेजाजी के षड़दादा व धौळिया जाटों के 16 वीं पीढी के भूपति उदयराज जी धौळिया ने वर्तमान खरनाल (पूर्व में करनाल भी) के खौजा व खौखर जाटों को पराजीत कर अपना गणराज्य स्थापित किया।
उधर काला जाटों का जायल के पास के बडीयासर जाटों के साथ भीषण रक्तपात हुआ, जिसमें काला जाटों के समस्त खेड़े उजाड़ दिये गये। 
यह युद्ध खींयाला का युद्ध कहलाता है। यह युद्ध लगभग 1350-1450 के मध्य में हुआ था। अवश्य ही खींयाळा अत्यधिक भीषण युद्ध रहा होगा क्योंकि यह युद्ध दो जाट शक्तियों के मध्य हुआ था। मगर यह युद्ध इतिहास में अंकित नहीं है..क्योंकि तब का जाट अनपढ था और अभी का जाट सोया हुआ। जो यह प्रयत्न जानने का प्रयत्न ही नहीं करना चाहता कि हमारे पूर्वज क्या थे। 
तो बंधुओं इस युद्ध में काला जाटों की निर्णायक हार हुई और उसके बाद काला जाट जायल क्षैत्र को छौड़कर चले गये और दूर के गांवो में बंटकर रहने लगे। आज जायल क्षैत्र में बडीयासर जाटों का अच्छा
कुनबा है। कई सौ गांवो में बडियासर जाट निवास करते हैं। 8-10 गांव पूर्ण रूप से बडियासर जाटों के है। 
खिंयाळा गांव व कंवरसी तालाब के पास कंवरसी झाड़ी व गांव में आज भी खिंयाळा युद्ध के जांबांज जाटों के देवळे मौजूद है।
.......
अब लौटते है फिर से तेजाजी के पूर्वजों की और...
..
जैसा कि अब तक पढा तेजाजी के षड़दादा उदयराज जी ने खरनाल परगने को अपनी राजधानी बनाया। और एक अच्छे गणपति के रूप में अपने गणराज्य को चलाया।
उनके बाद के गणपति निम्न प्रकार से थे।
उदयराज > नरपाल > कामराज > बोहितराज (बक्साजी) > ताहड़देव (थिरराज) > तेजराज (तेजाजी)
(यह वंशावली धौलिया जाटों के भाट भैंरूराम की पौथी में बाकायदा लिपिबद्ध है)
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बक्साजी कौन थे?
बक्साजी तेजाजी महाराज के पिता थे या दादा?
बक्साजी अगर दादा थे तो उनका नाम तेजाजी से क्यूं जौड़ा जाता है?
बक्साजी के पुत्र कौन कौन थे?
इन सभी प्रश्नों के उत्तर वीर तेजाजी के आशीर्वाद से जल्द ही आप तक पहुंचाने का प्रयास करूंगा।
~ जय वीर तेजाजी ~
लेखक-
Balveer Ghintala 'तेजाभक्त'
मकराना नागौर
9414980415
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संत कान्हाराम
सुरसुरा , अजमेर
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